प्लाज्मा थेरेपी तकनीक का इस्तेमाल ट्रायल बेसिस पर दिल्ली में भी होगा

कोविड-19 के खिलाफ प्लाज्मा थेरेपी तकनीक का इस्तेमाल अब ट्रायल बेसिस पर दिल्ली में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। उपराज्यपाल अनिल बैजल ने बुधवार को कोरोना के लिए हुई बैठक के बाद इस बारे में ट्वीट कर कहा कि कोविड19 के गंभीर मरीजों की जान बचाने के लिए दिल्ली में भी प्लाज्मा तकनीक का इस्तेमाल हो। उन्होंने साथ में यह भी कहा है कि केंद्र द्वारा जारी गाइडललाइन और एसओपी व प्रोटोकॉल का गंभीरता से पालन किया जाए।

आईसीएमआर ने पहले ही केरल में प्लाज्मा तकनीक के इस्तेमाल को हरी झंडी दे दी है। वहं पर इस पर आगे का काम जारी है। बुधवार को एम्स के डायरेक्टर डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने कहा कि यह तकनीक पुरानी है और पहले भी इसका इस्तेमाल होता रहा है। इस तकनीक में ठीक हुए मरीज को ब्लड डोनेट करने की जरूरत होती है, जब वो ब्लड डोनेट करते हैं, तभी इसका इलाज संभव है। उन्होंने कहा कि यह कुछ हद तक कारगर है, लेकिन सबसे जरूरी है कि जो मरीज ठीक हो रहे हैं, उन्हें ब्लड डोनेट करना होगा।

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डॉक्टर का कहना है कि इस मामले में सबसे ज्यादा जरूरी यही है कि जो मरीज ठीक हो गए हैं, उन्हें ब्लड डोनेट के लिए प्रेरित करना होगा। यह नहीं, मरीज की डोनेशन से पहले जांच की जाती है, ताकि उनमें कोई दूसरा इंफेक्शन न हो, फिर उसके ब्लड से प्लजमा निकाल कर दूसरे गंभीर मरीजों में चढ़ाया जाता है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया में इस वायरस के खिलाफ न दवा है और न ही कोई वैक्सीन, इसमें यह तकनीक एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आई है।

क्या है प्लाज्मा थेरेपी

मूलचंद के डॉक्टर श्रीकांत शर्मा ने बताया कि एक प्रकार से एंटीबॉडी का इस्तेमाल इस थेरपी में किया जाता है, इसलिए इसे प्लाज्मा थेरपी के अलावा एंटीबॉडी थेरपी भी कहा जाता है। किसी खास वायरस या बैक्टीरिया के खिलाफ शरीर में एंटीबॉडी तभी बनता है, जब इंसान उससे पीड़ित होता है। अभी कोरोना वायरस फैला हुआ है, जो मरीज इस वायरस की वजह से बीमार हुआ था। जब वह ठीक हो जाता है तो उसके शरीर में इस कोविड वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बनता है। इसी एंटीबॉडी के बल पर मरीज ठीक होता है। जब कोई मरीज बीमार रहता है तो उसमें एंटीबॉडी तुरंत नहीं बनता है, उसके शरीर में वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बनने में देरी की वजह से वह सीरियस हो जाता है। ऐसे में जो मरीज अभी इस वायरस से ठीक हुआ है, उसके शरीर में एंटीबॉडी बना होता है, वही एंटबॉडी उसके शरीर से निकालकर दूसरे बीमार मरीज में डाल दिया जाता है। वहां जैसे ही एंटीबॉडी जाता है मरीज पर इसका असर होता है और वायरस कमजोर होने लगता है, इससे मरीज के ठीक होने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है।