नदियों और जल-स्रोतों को सभ्यताओं का पालना कहा जाता है। किसी भी सभ्यता का अस्तित्व उसके निकटतम जल स्रोत के अस्तित्व से ही जुड़ा रहा है। आज भी यह निर्भरता कायम है। पुरातन काल में झीलों और तालाबों को कीर्ति व समृद्धि का प्रतीक माना जाता था। यही कारण है कि तत्कालीन शासक अधिक से अधिक झीलें व तालाब खुदवा कर अपना नाम इतिहास में दर्ज कराने के लिए आतुर रहते थे। इसके पीछे वर्षा जल संचय का सिद्धांत कार्य करता रहा है। देश में लगभग 10360 छोटी-बड़ी नदियां व असंख्य (अनुमानित आंकड़ा 13 लाख के करीब) झीलें और तालाब हैं, जिनमें से अधिकांश अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महज 1,87,888 झीलों वाला देश फिनलैंड झीलों के देश के नाम से प्रसिद्ध है जबकि हमारे यहां झीलों की संख्या वहां से कहीं अधिक है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह भी है कि देश में आज तक झीलों व नदियों की वास्तविक संख्या को लेकर राष्ट्रीय डेटा बेस तैयार नहीं किया जा सका है।

कई जलस्रोतों की दुर्गति का आलम यह है कि अकेले बंगलुरु शहर में कुछ दशक पहले तक 272 झीलें थीं जो अब केवल 70 रह गई हैं। यही कारण है कि बंगलुरु शहर भीषण जल संकट से जूझ रहा है। यही हालात कमोबेश देश के अन्य क्षेत्रों में भी बन रहे हैं या निकट भविष्य में बनने का खतरा है। घरेलू गंदगी वाहित मल व औद्योगिक अपशिष्ट से बजबजाती अधिकांश नदियां केवल नाली बन कर रह गई हैं। अतिक्रमण के कारण सिकुड़ चुकी यहीं नदियां बरसात के मौसम में बाढ़ जैसे हालात पैदा करती हैं जिसे वर्तमान संदर्भ में मानव निर्मित बाढ़ कहा जा सकता है। बेहद गंभीर हो चली स्थिति को नियंत्रण में लाने के ठोस कदम उठाने होंगे। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत केवल 34 नदियों को शामिल किया गया है। सभी नदियों को इस योजना के दायरे में लाना होगा।

कुछ समाजसेवी और स्वयंसेवी संगठनों ने निश्चित रूप अच्छे प्रयास किए हैं और कर रहे हैं जिससे बहुत-सी नदियों और झीलों को पुनर्जीवन मिला है। सरकार द्वारा ऐसी उपलब्धियों को प्रचारित किया जाना चाहिए। साथ ही आवश्यक सहयोग देना चाहिए। ऐसे प्रयासों को गति देने की जरूरत है। जल स्रोतों को संरक्षित व पुनर्जीवित करने के लिए बड़े-बड़े औद्योगिक संस्थानों की जवाबदेही भी तय करनी होगी। सामाजिक दायित्व और जिला खनिज निधि जैसी योजनाओं का उपयोग अधिक से अधिक नदियों-झीलों के अस्तित्व को बचाने में किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त आम जनता को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। स्थानीय लोग आसपास स्थित कुओं, बावड़ियों, तालाबों, नदियों के सजग रक्षक व संवर्धक बनें। जल है तो हम हैं।