देश का रियल एस्टेट क्षेत्र भी सुस्ती के दौर से गुजर रहा है। इसका असर मकानों की बिक्री पर भी पड़ रहा है। संपत्ति सलाहकार कंपनी जेएलएल की रिपोर्ट में कहा गया है कि मकानों में ग्राहकों की दिलचस्पी कम होने से देश के सात प्रमुख शहरों में 4.62 लाख करोड़ रुपये की आवासीय परियोजनाएं अटकी हुई हैं। इनमें 84 फीसदी परियोजनाएं सिर्फ दिल्ली-एनसीआर और मुंबई में हैं। अकेले दिल्ली-एनसीआर में यह आंकड़ा 62 फीसदी और मुंबई में 22 फीसदी है। इनमें से अधिकतर अपार्टमेंट उच्च-मध्यम और प्रीमियम श्रेणी के हैं।

जेएलएल ने अपनी शोध रिपोर्ट में मुंबई को छोड़कर अन्य शहरों के लिए 75 लाख रुपये तक के मकानों को ‘किफायती एवं मध्यम श्रेणी’ में रखा है, जबकि मुंबई में ऐसे मकानों की कीमत एक करोड़ रुपये तक है। जेएलएल इंडिया के मुख्य अर्थशास्त्री एवं शोध प्रमुख समंतक दास का कहना है कि यह आम धारणा है कि पूरे रियल एस्टेट क्षेत्र में संकट है, जो सही नहीं है।

मुख्य रूप से उच्च-मध्यम और प्रीमियम श्रेणी की आवासीय परियोजनाएं ही अटकी हुई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जो आवासीय परियोजनाएं अटकी हुई हैं, उनकी मुंबई में औसत कीमत 1.99 करोड़ रुपये है। वहीं, बंगलूरू में इनकी औसत कीमत 95 लाख, हैदराबाद में 94 लाख, चेन्नई में 87 लाख, दिल्ली-एनसीआर में 75 लाख, पुणे में 65.62 लाख और कोलकाता में 28.83 लाख रुपये है।

जीएसटी के बाद से गोदामों के लिए 3,500 करोड़ का हुआ निवेश

संपत्ति सलाहकार सीबीआरई के सर्वे के मुताबिक, जीएसटी लागू होने के बाद से गोदामों के लिए गुणवत्तापूर्ण जगह की मांग तेजी से बढ़ी है। इस कारण 2017 के बाद से औद्योगिक और लॉजिस्टिक सेगमेंट ने 50 करोड़ डॉलर (करीब 3,500 करोड़ रुपये) का निवेश आकर्षित किया है।

सर्वे में शामिल 70 फीसदी उत्तरदाताओं का कहना है कि ई-वे बिल के कारण कारोबारी सुगमता में सुधार हुआ है। इससे कार्गो स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट प्रॉसेस की काफी बाधाएं खत्म हुई हैं। वहीं, 40 फीसदी का कहना है कि जीएसटी लागू होने के बाद से गोदामों की संख्या बढ़ी है।

सीबीआरई ने कहा कि आने वाले समय में गोदामों की मांग बढ़ेगी और इस साल गोदाम लेने के लिए जगह की मांग पिछले साल के मुकाबले 10-15 फीसदी बढ़कर 2.5 से तीन करोड़ वर्ग फुट तक पहुंच सकती है।