कोरोनाः जनता-कर्फ्यू जरूरी

कोरोना महामारी का दूसरा हमला जितनी ज़ोरों से भारत में हो रहा है, शायद दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं हुआ। एक दिन में सवा दो लाख मरीज़ों का होना भयंकर खतरे की घंटी है। हजारों लोग रोज़ मर रहे हैं। उनमें बुजुर्ग तो हैं ही, अब जवानों की संख्या भी बढ़ने लगी है। कई शहरों में श्मशान घाट और कब्रिस्तान छोटे पड़ रहे हैं। मरीज़ लोग दवा और पलंगों की कमी के कारण दम तोड़ रहे हैं।

कोरोना की दवा की कालाबाजारी शुरू हो गई है। मध्यवर्गीय और गरीब आदमी तो उसे खरीद भी नहीं सकता। किसी दवा-विक्रेता के पास कल सैकड़ों फर्जी इंजेक्शन इंदौर में पकड़े गए हैं। इससे ज्यादा दुखद और शर्मनाक बात क्या हो सकती है ? यदि वे इंजेक्शन नकली हों तो उनके निर्माता और विक्रेताओं को तत्काल मृत्युदंड क्यों नहीं दिया जाना चाहिए ? सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अभीतक बहुत सराहनीय काम कर दिखाया है लेकिन अब उसकी असली परीक्षा की घड़ी आ गई है।

सरकार का गणित थोड़ा जरूर गड़बड़ाया लेकिन यह महामारी बढ़ी है, सरकार के नहीं, जनता के कारण ! भारत की जनता ने सावधानी लगभग छोड़ दी। कई शहरों में हजारों लोग मुखपट्टी के बिना घूमते हुए आज भी देखे जा सकते हैं। इसके अलावा कुंभ-स्नान के लिए लाखों लोगों का हरिद्वार में इकट्ठे होना और मस्जिदों में बैठकर नमाज़ का आग्रह करना घनघोर अंधविश्वास और लापरवाही का प्रमाण है। हरिद्वार में हजारों लोग संक्रमित हो गए और एक महंत भी चल बसे। हमारे नेता हमारे साधुओं से भी एक कदम आगे हैं। प. बंगाल में चुनावों के दौरान क्या हो रहा है ? न तो नेताओं के मुख पर पट्टी है और न ही भीड़ के ! कई राज्यों में रात का कर्फ्यू लगा दिया गया है।

  • आश्चर्य तो यह है कि संक्रमण को रोकने के पारंपरिक भारतीय तरीकों पर कोई जोर नहीं दे रहा है, क्योंकि वे सस्ते और सुलभ हैं। उनसे डाॅक्टरों को मोटी कमाई भी नहीं होनी है। कोरोना की इस भयंकर वापसी के दौरान भी लोग जन्मदिन, शादी-समारोह, श्रद्धांजलि सभा आदि के लिए भीड़ जुटाने में ज़रा भी संकोच नहीं कर रहे हैं। यदि भारत के लोग अगले 15 दिन के लिए अपने पर खुद कर्फ्यू लगा लें तो निश्चय ही कोरोना को काफी काबू किया जा सकता है।